बिलासपुर :— छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य महिला आयोग में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को एक बड़ा झटका दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त विभाग द्वारा जारी ”श्रम सम्मान निधि” का लाभ केवल सीधे शासकीय विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को ही मिल सकता है।चूंकि राज्य महिला आयोग एक स्वायत्त निकाय है, इसलिए इसके कर्मचारी तकनीकी रूप से ”शासकीय सेवक” नहीं माने जा सकते और वे इस योजना पर अपना दावा नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
अभय सिंह, विष्णु सिंह ठाकुर, राजेंद्र साहू सहित राज्य महिला आयोग रायपुर में कार्यरत कुल 14 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों द्वारा हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त विभाग द्वारा 28 अगस्त 2023 को जारी परिपत्र/दिशानिर्देशों के तहत उन्हें भी ”श्रम सम्मान निधि” का लाभ दिया जाए और इस संबंध में विभाग के समक्ष लंबित उनके अभ्यावेदन का जल्द निराकरण करने का निर्देश दिया जाए। सुनवाई की शुरुआत में ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता पक्ष के सामने एक बुनियादी कानूनी प्रश्न रखा।
न्यायमूर्ति ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि क्या ये सभी 14 याचिकाकर्ता वास्तव में राज्य सरकार के प्रत्यक्ष कर्मचारी हैं। इस पर याचिकाकर्ता की अधिवक्ता अदालत को कोई स्पष्ट या संतोषजनक उत्तर नहीं दे सकीं। इसके बाद कोर्ट ने मामले के रिकार्ड और याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों का खुद गहराई से अवलोकन किया। दस्तावेजों से यह साफ हो गया कि याचिकाकर्ता छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के अधीन दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहे हैं, न कि सीधे राज्य सरकार के किसी मुख्य प्रशासनिक विभाग के तहत।
हाई कोर्ट का फैसला: ”अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकते”
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि चूंकि याचिकाकर्ता शासकीय कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए उन पर वित्त विभाग द्वारा 28 अगस्त 2023 को जारी वह परिपत्र लागू ही नहीं होता जो विशेष रूप से सरकारी सेवकों के लिए है। ऐसी स्थिति में, आयोग के दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी कानूनी तौर पर ”श्रम सम्मान निधि” के लाभ को अधिकार के रूप में क्लेम नहीं कर सकते। अदालत ने माना कि इस मामले में भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 (हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार शक्ति) के तहत किसी भी हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है, क्योंकि याचिका का कोई कानूनी आधार ही नहीं है. इसी के साथ हाई कोर्ट ने दैनिक वेतनभोगियों की इस याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।